Saturday, November 29, 2008

पंचायतनामा: ठहरें, जरा आतंकियों के बारे में भी सोचें....

पंचायतनामा: ठहरें, जरा आतंकियों के बारे में भी सोचें....सन सैतालिस में यदि, हो जाता यह युद्ध.
ना होता भारत खण्डित,निश्चित जीतते युद्ध.
जीतते हम यह युद्ध, देश का गौरव बढता.
मेरा शाश्वत देश, धर्म का मार्ग पकङता.
कह साधक सांस्कृतिक युद्ध से बचना मुश्किल.
युद्ध से बचकर इस दुनियाँ में जीना मुश्किल.

भड़ास: तांडव और नहीं

भड़ास: तांडव और नहीं
पाँच बरस में बदलते, नागनाथ-साँपनाथ.
लङने का नाटक करें, प्रभु तीसरा नाथ.
नहीं तीसरा नाथ, वोट से जिसे ला सको.
क्यों ना सोचते, मार्ग तीसरा तुम बना सको.
कह साधक कवि,विज्ञ-जनों की इस महफ़िल में.
वोट-तन्त्र से निकलो सोच के पाँच बरस में

Thursday, November 27, 2008

कविताओ के मन से....................: आज मेरा देश जल रहा है , कोई तो मेरे देश को बचा ले

कविताओ के मन से....................: आज मेरा देश जल रहा है , कोई तो मेरे देश को बचा ले
हजार साल से जल रही, यह इस्लाम की आग.
भारत कब से लङ रहा,अरे विजय अब जाग.
अरे विजय अब जाग, ना बुला पैगम्बर को.
देश बचाना है तो, दुत्कारो ईसा-पैगम्बर को.
कह साधक जागे प्रलयंकर शिव-शंकर अब.
भस्म करे भय-भ्रम विजयों का शिव-शंकर अब.

भड़ास: आतंकवादी हमला और मेरा रात्रि जागरण

भड़ास: आतंकवादी हमला और मेरा रात्रि जागरण
नेता कैसे बोलेगा, उसे चाहिये वोट.
मुसलमान को बोल दो, दे ना सके वो वोट.
दे ना सके वह वोट,तो नेता चिल्लायेगा.
उनको खुद गद्दार, ये नेता बतलायेगा.
कह साधक मोमिन सब जाने, ना बोलेगा.
उसे मिल रहे नोट,तो वह कैसे बोलेगा!

Wednesday, November 26, 2008

मुम्बई का सच

बोलो क्या अब भी रखें,साम्पर्दायिक सद्भाव?
वे हम पर हमला करें, हम रखें सद्भाव.
हम रखें सद्भाव, और मर जायें शान से.
जैसे सारे अफ़सर, मारे गये जान से!
पूछे साधक, एक बन्दूक नेता पर रखके.
साम्प्रदायिक सद्भाव, बोलो क्या अब भी रखें?

शपथ हमें इस राष्ट्र की,वरण विजय कर लेंगे.
घर में घुस बैठे दुश्मन को,मौत की सजा देंगे.
मौत की सजा देंगे,अब कुछ देर नहीं है.
ईश्वर के घर देर भले.अंधेर नहीं है.
कह साधक कवि,राजनेता आङे आयेंगे.
क्रुद्ध हिन्दू तब भी, वरण विजय कर लेंगे.

युद्ध निमन्त्रण दे रहा,लो कर में तलवार.
टाल गये सैतालिस में,अब थामो हथियार.
अब थामो हथियार,बचा लो अपनी भूमि.
नेता बेचे वोट के बदले, अपनी भूमि.
कह साधक इन नेताओं का काल आ रहा.
लो कर में तलवार, युद्ध निमन्त्रण दे रहा.
क्यों आयेंगे बाहर से,आतम्की सरदार.
गली-गली में हैं भरे,सौ-सौ नही-हजार.
सौ-हजार या लाख, कौन गिन पाये इनको.
ये दामाद कोई कुछ ना कह सकता इनको.
कह साधक कवि,क्या हो सकता अब बाहर से.
भीतर ही बदलो, क्यॊ सोचते हो बाहर से.

गाँधी-नेहरु वंश को, भुगत रहा है देश.
सदाशयता की अति हुई, अब तो जागे देश.
अब तो जागे देश,समझ ले बात ये पक्की.
धर्म-युद्ध से बचना मुश्किल,शश्वत-सच्ची.
कह साधक कवि,टाला सैतालिस में जिसको.
भुगत रहा है देश, गाँधी-नेहरु वंश को.

जो चाहे कर सकते हैं,फ़ायरिन्ग, बम-विस्फ़ोट.
उनकी रहम पे देश है, क्या यह कम विस्फ़ोट!
क्या यह कम विस्फ़ोट,कि नेता उन्हें बचाते.
न्याय-कानून-संविधान, की दोहाई देते!
कह साधक जो यह सब कुछ बदल सकते हैं.
उठे हिन्दू ललकार, जो चाहे कर सकते हैं.

Saturday, November 22, 2008

ओबामा की विजय का भारतीय पक्ष : काउंसिल फ़ॊर इंडियन फ़ॊरेन पॉलिसी

ओबामा की विजय का भारतीय पक्ष : काउंसिल फ़ॊर इंडियन फ़ॊरेन पॉलिसी
अपनी भाषा-परम्परा,हो अपना परिवेश.
गौरवशाली फ़िर बने, अपना भारत देश.
अपना भारत देश, विश्व का मंगल चाहे.
लेकिन दुष्ट-तन्त्र के कारण कर ना पाये.
कह साधक ओबामा की है भिन्न परम्परा.
भला अपना परिवेश,अपनी भाषा-परम्परा.

Wednesday, November 19, 2008

बदलता संगघ

आदरणीय संपादक,पाँचजन्य साप्ताहिक. सादर नमस्कार.
१४ सितम्बर के अंक में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा बिहार बाढ राहत कार्य की छ्पी फोटो देख कर मन में वेदना भी हुई, कई प्रश्न भी खडे हुए .फोटो में दिखाया गया है कि स्वयं सेवक संघ की हाफ-पेन्ट पहनकर मुसलमानों के रोजे तुडवा रहे हैं, उनको आदर पूर्वक भोजन करा रहे हैं. निश्चित ही संदेश यह देना चाहते हैं कि,
-१- संघ को सांप्रदायिक समझना भूल है, वह तो मुसल्मानों को अपना बंधु ही मानता है.
-२-संघ सेवाभावी है,पूरी मानवता की सेवा करता है-बिना किसी भेद-भाव के.
-३-यह देश सबका है, हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई-कसाई …आपस में सब भाई भाई….आदि,आदि
श्री आलोक जी ने फोन पर बताया कि, फोटो संघ के आधिकारियों ने ही भेजी है, एक नहीं कई फोटो भेजी-सारी की सारी इसी प्रकार की हैं, तो हम क्या करें…दुःख तो हमें भी है,…

यह सुनकर वेदना और बढी .प्रश्न विकराल हैं-
-१- क्या संघ ने अपने अपरिवर्तनीय सिद्धान्तों को छोड दिया है ? ’हिन्दुत्व ही राष्टीयत्व है’ वर्षों तक इस निष्ठा को ह्र्दय में संजोये जिन हजारों- लाखों स्वयं सेवकों ने अपना जीवन झोंक दिया, क्या वे गलत थे ?
क्या संघ-निर्माता डाक्टर हेडगेवार भी गलत थॆ ?
मान लिया कि किसी चिन्तन बैठक (!) में ऐसा निर्णय करलिया गया हो… तो क्या इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिये ? देर-सवेर ही सही; कोमरेड भी अपनी भूलें स्वीकार कर लेते हैं भाई साहब ! फिर हम तो स्वयं को भारत की सनातन-सांस्कृतिक धारा के पुरोध्धा समझने वाले भद्र लोग हैं ! और फिर प्रार्थना में परिवर्तन !
वयं हिन्दु राष्ट्रांग्भूता…त्वया हिन्दुभूमे ....यह सब नहीं चलेगा ना ! पर प्रार्थना तो हमारा मन्त्र है, इतने वर्षों तक ह्रदय पर हाथ रखकर करोडों स्वयंसेवकों ने साधना की है इस मन्त्र की ! मन्त्र भी सुविधानुसार बदले जा सकेंगे ?
-२-इतने वर्षों सेमुसलमानों को बन्धु बनाने का गंभीर प्रयत्न चल रहा है…कितने बने ?और जिन्होंने किसी न किसी स्वार्थवश बनने का नाटक भी किया है, उनमें से कितनों को अपने समाज का साथ मिला है ?कितने मुसलमानों ने अपनी बेटियां हिन्दुओं को देने की मन्शा जताई ? कितने मुसलमान गर्व पूर्वक कहने लगे हैं कि उनकी रगों में भगवान श्रीराम का रक्त बहता है और बाबर हुमायूँ आक्रांता थे ? यही कसौटी होगी ना सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की ! या फिर कसौटियाँ बदल गई हैं –जैसे सरकारें अपनी सुविधा से गरीबी कि रेखा ही बदलती रहती है ! और कितने आयामों में घुसी है ऐसी सरकारी प्रवृति ?... संघ पर समाज आँख मूँदकर विश्वास करता है भाई साहब…महाजनो येन गतः स पन्थाः…इस प्रकार पूरा मार्ग ही भ्रष्ट करदेने का कलंक संघ की अब तक की सारी तपस्या पर पानी नहीं फिरा देगा क्या ?...मुसलमान को भाई बनाने का जितना और जैसा प्रयत्न महात्मा गाँधी ने किया,वैसा तो सौ संघ-परिवार मिलकर भी सात पीढीयों तक नहीं कर पायेंगे…और तब भी कुत्ते की पूँछ टेढी की टेढी. मूसल ही मानता है , उसे प्यार देकर कैसे मनायेंगे जी… यह तो एक मूसल-मान का अपमान ही हुआ ना !

-३- भारत के साथ गत हजार वर्षॊं से जैसा अत्याचार चला रखा है…पाकिस्तान दिया…फिर पाकिस्तान के खूनी पंजों से बंगला देश मुक्त कराने में भारत ने कितनी कुर्बानियां दी…लेकिन …एक की बजाय दो दुश्मन देश हैं आज भारत के पास…फिर भी मुसलमान से बन्धुत्व !...वह भी संघ की प्रेरणा से…राम राम !

-४-श्री गुरुजी जन्म-शताब्दी वर्ष सारे विश्व में मनाया गया… महाराष्ट्र ईकाई का एक फ़ोल्डर देखा था…आयोजन समिती में तीन मुसलमानों के नाम देखकर भौंच्चक्का रह जाना पडा. …हम बंगाल में रहते हैं… मुस्लिम बहुल जिलों के गावों में युवा-किशोर हिन्दू लडकियों का बडे पैमाने पर यौन शोषण चलता है…कोई कुछ नहीं बोल पाता… विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल टुकुर टुकुर देखते रहते हैं…काली के कलकत्ते में काली मन्दिर हटाने का फ़र्मान सरकारी कारिन्दे भेज देते हैं…कौन सामने आये ?...जी हाँ… कलकत्ते के साल्टलेक ई.सी.७१ की बात कररहा हूँ…संघ स्वयं तो चुप बैठता ही है… जो कुछ मुट्ठीभर युवक अपनी जान हथेली पर रखकर इसका विरोध करने आगे आते हैं…संघ उनका यह कहकर विरोध करता है कि अब वे प्रचारक नहीं रहे ! निष्ठा संस्कृति-समाज के प्रति या सिर्फ़ संगठन…भले कुछ ना… करे तबभी संगठन…संगठन के लिये संगठ्न का यह कैसा परिणाम भाई साहब !
और स्वयं पूजनीय श्री गुरुजी ने इस हिन्दू राष्ट्र के पहला दुश्मन मुसल्मान को गिना था…आप लाख कोशिश करलें, मुसलमान इस बात को भूलेगा क्या ? अरे, हमने उसको खुश करने के लिये क्या क्या नहीं किया…उसकी कुरान उसे काफ़िर से दोस्ती करने और उसके साथ खुश होने से मना करती है… कुरान को छोडकर वह आपकी बात मानले, यह तो आपकी ज्यादती है भाई साहब !

५आलोकजी ने कहा कि संघ के ऐसी ही तस्वीरें भेजी …और पाँचजन्य ने छाप दी…ओह ! इसका अर्थ ? संघ सिद्धान्तों के विरूद्ध चले तब भी स्वयंसेवक अपनी बुद्धि न लगाये…इसे अधिकारी सेवक कहेंगे या स्वयंसेवक !
निष्ठा देश-संस्कृति-समाज के प्रति या अधिकारी के प्रति ?...आग्या ! एकचालकानुवर्तित्व !! अनुशासन !!!
एकचालकानुवर्तित्व का अर्थ तो यह था कि संघ पूरा का पूरा एक ही बात सोचता है…जो स्वयंसेवक सोचता है, वही बात सरसंघचालक बोलता है…ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर…अब क्या यह अर्थ भी बदल दिया…फिर से सुविधानुसार !और पाँचजन्य संघ का मुखपत्र है क्या ? संघ तो नहीं मानता कि पाँचजन्य या आर्गेनाईजर उसके मुखपत्र हैं . बार बार इन्कार करते हैं…खैर, स्वयंसेवक के मन का भाव…हाँ…मातृ-संगठन के प्रति आदर रहना ही चाहिये…किन्तु मौलिक प्रश्नों पर भी यदि विरोध न कर सकें,प्रतिप्रश्न न कर सकें…यह क्या ठीक होगा ? पाँचजन्य की ललकार तो भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य सभी के लिये थी…बात संस्कृति-रक्षा की है, और परिस्थितियां बिल्कुल वैसी ही हैं जैसी महाभारत युद्ध से पूर्व थी…द्रौपदी का चीरहरण लगातार जारी है…उसकी चीखें भी …और संघ मूक…दरबार में मौजूद भी है…उसकी मौजूदगी समकालीन सभी वीरों को रोक रही है , द्रौपदी की रक्षा करने से…न हो तो उसकी रक्षा के प्रयत्न मे अपनी जान देने से .
तभी तो पाँचजन्य भी… पाप की भागीदारी कर लेता है…विकर्ण तक की यही दुविधा थी कि जहाँ भीष्म हैं वहाँ अन्याय कैसे हो सकता है ! जब संघ कह रहा है कि मुसलमान राष्ट्रवादी हो सकता है…तो सबको कुरान खोलकर देखने की जरूरत क्या है… है ना संघ…है ना भीष्म पितामह…सभी राष्ट्रवादियों का बाप… अजेय..सर्वशक्तिमान..बाल ब्रह्मचारी …तत्वग्य…धर्माचरण में आदर्श…वह बचा लेगा देश को विभाजित होने से…जैसे गाँधी बाबा ने बचाया था !.... …. हे फाँचजन्य !मत छ्लो ! मत बनो निमित्त हिन्दू मन को भटकाने में…मत होने दो स्वयं को किसी भर्मित भीष्म का उपकरण.! राष्ट्र और संस्कृति रक्षण का प्रश्न हो तो नचिकेता बनना पडता है… अपने ही बाप को शिक्षा देने के लिये मृत्यु के द्वार तक जाना गौरव की बात होती है…है कि नहीं!

-६- सिद्धान्त छोडने लगो तो पता ही नहीं चलता कि क्या क्या छूटने लगा है… याची देही याची डोळा की त्वरा गई , नहीं नहीं करते भी वोट-राजनीति के चंगुल में फसे,राम-मन्दिर के गौरवशाली प्रकरण तक की जिम्मेदारी से पीछे हट गये…अब तो चिन्तनशील वरिष्ठ प्रचारकों तक को सरसंघचालकजी के २०११ की घोषणा की सफलता का भरोसा नहीं है…नाम देना उचित नहीं , लेकिन यह तो ऐसा रहस्य है जो सबको पता है…पाँचजन्य नहीं बोलेगा तो कौन बोलेगा ?उन्हें बोलिये…हम गलत हैं तो हमें बोलिये…छापना या न छापना आपकी मर्जी, मगर मौन मत हो जाईयेगा भाई साहब ! जो प्रश्नों से बचता है , उसे मरना पडता है… मरने से तो अच्छा है कि राष्ट्र के इस दुश्मन से संघर्ष करें…हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग्यं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम…तस्मात्वमुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत्निश्चय .

चाहें तो इसे किसी को भी भेज सकते हैं ………….उम्मेद सिंह बैद साधक

Tuesday, November 18, 2008

मुसलमान

फिल्म सूट ओन साईट-समीक्षा
जगमोहन मून्दङा शायद ब्रिटैन में रहते हैं,पर फिल्म को ब्रिटेनी पृष्ठभूमि देने का कारण सिर्फ़ यही नही कि उनको वैसे विषय के लिये उपयुक्त कलाकार आसानी से मिल जायेंगे ( दो-तीन को छोङ कर सारे ही इंगलिश पात्र हैं ), बल्कि इस फिल्म के जरिये यह कहना चाहते हैं कि भारत आतंकवादियों के लिये जितना नरमी दिखाता है,ब्रिटेन उतना ही सख्त है.इतना सख्त, कि सिर्फ़ शक के आधार पर एक युवा मुस्लिम युवक को पुलिस अफसर गोली से मार देता है,इसके कारण उठने वाले सारे प्रश्नों का मुकाबला करते हैं,कहीं कोई समझौता नहीं, वोट-बैन्क-जनित समीकरण नहीं दिखता ब्रिटेन में.पुलिस-प्रशासन पर कोई अनचाहा राजनैतिक दबाब भी नहीं दिखा.

“प्रश्न यह नहीं कि हर मुसलमान आतंकवादी है कि नहीं,यहाँ प्रश्न यह है कि हर मुसलमान आतंकवादी क्यों है ?...और दोनों ही प्रश्नों के उत्तर सभी को मालूम है…”-यह संवाद भारत में अत्यन्त संवेदनशील माना जायेगा, किन्तु ब्रिटेन का एक पुलिस-आफ़िसर संजीदगी पूर्वक अपने विरूद्ध जाँच कर रहे आफ़िसर से कहता है .श्री तरुण विजयजी का स्मरण आता है…उनके टी.वी. साक्षात्कार पर कहे गये ये शब्द अब तो मुहावरा सा बन गये हैं,देश में ही नहीं, विदेसी कथानकों में इस मुहावरे का प्रयोग आम-धारणा की सूचना है.

पूरा विश्व मानस आज इस्लाम और मुसलमान समाज की आक्रान्ता वृत्ति की समालोचना में लगा है.
साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है-सिनेमा साहित्य की ही एक सशक्त विधा है- और भारतीय फ़िल्मकार इस विषय पर प्रामाणिक कार्य कर रहे हैं. आश्चर्य होता है कि सेकूलर राजनेता, इन्डिया की न्याय-कानून व्यवस्था,और अंग्रेजी मीडीया कोई हाय-तौबा क्यों नहीं कर रहा है !सिलसिला तो खुद आमीर खान ने ही शुरु कर दिया था-फ़िल्म फ़ना से. फ़ना का आतंकवादी हीरो मुसलमान- उसकी सोच पूरे मुस्लिम समाज की सोच को प्रतिबिम्बित करती है,इस्लाम का परिचय देती है. इस्लाम की असहिष्णुता, मुल्क और यहाँ के मूल समाज के प्रति उनकी धारणा… सभी कुछ तो स्पष्ट है. …फिर प्रसिद्ध निर्माता सुभाष घई ने ब्लेक एन्ड वाईट दी. निर्देशक ने बहुत कोशिश की-सेकूलर बनाने की,स्वयं हीरो अनिल कपूर एक हिन्दू प्रोफ़ेसर के रूप में कुरान को मासूम बताने की जिद्द करता है-किन्तु साथ खङा मौलवी ही हिन्दू सदाशयता को एक तरफ करके कहता है कि इस्लाम का भाईचारा सिर्फ़ अपनी कौम के लिये है,काफ़िर को दोजख दिखाना तो अल्लाह-ताला का ही हुक्म है. !

आमीर फ़िल्म तो इससे एक कदम आगे बढ जाती है-मुस्लिम मानसिकता को बेपर्दा करने में.वैसे बेपर्दा करने की बात ही नहीं, क्योंकि सभी मुस्लिम विद्वान-उलेमा आदि एकमत हैं… सिर्फ़ हिन्दू ही उदारता में सभी धर्म एक समान है का राग अलापते रहते हैं. आमीर का नायक इन्गलैंड से डाक्टरी पढकर भारत लौटता है, और एयर-पोर्ट पर ही चैकिंग- अफ़सर के व्यवहार से हैरान रह जाता है, कि मुसलमान होने मात्र से उसपर आतंकवादी होने का शक किया जा रहा है. फ़िल्म अपने हर फ़्रेम में यही बात बार-बार दोहराती है, स्वयं मुसलमाअनों के द्वारा कहलवाती है, कि भारत में रहने वाला हर अमीर-गरीब, पढालिखा-अनपढ मुसलमान आतंकवादी है. नायक यह साबित करना चाहता है कि वह आतंक के इस भयानक खेल का हिस्सा नही है, तो उसे अन्त में मरना पङता है. नायक के एक अच्छे संदेश हेतू मरने का लाभ यह होना चाहिये था कि, मुसलमानों को अपनी सोच पर अफ़सोस हो जाता. निर्देशक इस बात को आराम से दिखा भी सकता था, किन्तु नहीं.
फ़िल्म का नाम देखकर भी चौंकना पडता है. सूट ओन साईट. अंग्रेजी में होता है सूट एट साईट. ….इस सूट ओन साईट का क्या मतलब! जी हाँ, आप ठीक ही समझे हैं. सूट ओन साईट- देखते ही गोली मारो….पश्चिमी देशों में यही धारणा आम हो रही है….हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है…क्रिया के समान…और उसके विरुद्ध.
प्रकृति का यह नियम वर्तमान में शायद सहिष्णु और उदार हिन्दु प्रकट करने लगा है…..साध्वी प्रज्ञा सिंह पर यदि विस्फ़ोट कराने के आरोप सिद्ध होते हों, तो यही समझा जायेगा.

आया

नवम्बर,२००८ का टेलीग्राफ़ देखें.मुख-पृष्ठ की पहली खबर…. भारत की सभी उच्च-शिक्षा संस्थानों को शिक्षा-सत्र के ठीक बीच में नये छात्रों को प्रवेश देना पङेगा. मानव- संसाधन- मन्त्रालय ने सभी व्यवहारिक कठिनाईयों को ताकपर रखकर विश्व-विद्यालयों को यह आदेश दे दिया है. .बी.सी. के पाँच हजार छात्रों को उपलब्ध रिक्त स्थान भरने के नाम पर लिया जाये, यदि इस कोटे के सभी छात्र ले लिये जाने के बाद भी कोई स्थान बच जाता है, तो उसके लिये योग्यतानुसार अन्य छात्र लिये जा सकेंगे.- इस सरकारी फ़रमान के फ़लितार्थ कुछ इस प्रकार होंगे--५००० .बी.सी. के छात्र देश के बीसीयों ऊच्च शिक्षा संस्थानों में भर्ती किये जायेंगे.गत आधे साल में जितनी पढाईहो चुकी है,उसे इन छात्रों को अतिरिक्त रूप से पढाने की व्यवस्था संस्थानों को करनी पङेगी.निश्चित है कि संस्थान इस्की पूरी व्यवस्था करेंगे, इसके लिये केन्द्र से अतिरिक्त धन भी उपलब्ध कराया गया है; किन्तु प्रश्न यह है कि जो छात्र सामान्य से कम बुद्धि के रहे हैं,; पहले से सरकारी कृपांक पाकर ही उत्तीर्ण होते आये हैं, वे पढाई की दोहरी मार कैसे झेळ पायेंगे?...--उनको फ़ेल तो नहीं किया जा सकता ना! किसी किसी प्रकार उनकओ पास करके समाज के मत्थे मढ दिया जायेगा. कोई दाक्टर बनेगा, कोई इन्जीनियर.अब यह इन्जीनियरडाक्टर कैसे होंगे, इसकी भविष्यवाणी तो मेरे-आपके जैसा सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी कर सकता है. तो इनकी नौकरी की गारंटी भी तो सरकार की ही है- निजी प्रतिष्ठानों में तो योग्यता के आधार पर ही लिया जाता है. सरकारी सेवाओं में योग्यता नकारी जाती है.राजनैतिक समीकरण,रिश्वत,जातिवाद,भाई-भतीजावाद,काईयाँपन और काहिली ईत्यादि नौकरी के आधार बनते हैं.तो वह बनेगा सरकारी नौकर,सरकारी ठसक के साथ.--सरकारी डाक्टर ईलाज करेगा मरीजों का- आता कुछ है नहीं- तो मरीज का मरना या ज्यादा बीमार पङना तय.इस प्रकार सैकङों केस होने पर उस डाक्टर (या इन्जीनियर) की ख्याति (!) हो जायेगी. अपने अन्य अनेक सरकारी मित्रों की तरह मरीज उसके नाम से कतराने लगेंगेजैसे आज कोई खाता-पीता आदमी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढने के लिये नहीं भेजता, जो भेजते हैं मिड-डे मील के लिये. अपना र्जगार खुद कमाने नही देगी सरकार, रोटी बाँटकर सबको भिखारी बनाकर रखेगीताकि बदले में हमेशा वोट मिलते रहें.--एक दुष्परिणाम सबसे गंभीर! लोग-बाग डाक्टर-इंजीनियर से उनकी जाति पूछेंगे. यदि कोई ओ.बी.सी. का हुआ तो उससे ईलाज ही नहीं कराएंगेमरना थोङे ही है!

इस प्रकार सरकार के इस कदम से देश और जनता का बँटाढार होना तय है. यदि कुछ बाकी रह जये, तो इसका इन्तजाम भी किया है.गोआ और हरियाणा में डेन्टल कालिज खोलने की पेशकश हुईधनिकों ने पूरे मनोयोग से भवन आदि खङे कियेसरकारी अपेक्षा के अनुरुप सारे सामान जुटायेऊच्च पदाधिकारियॊं और राजनेताओं को ऊँच्ची-ऊँची रिश्वतें तक दी गईकरोङों खर्च हो जाने के बाद सरकारी परमिशन नहीं मिलीकोर्ट की शरण में हैंऔर न्यायालयों में ऐसे मुकद्दमों के निपटारे में कितनी पीढीयाँ खप जाती हैं, यह किससे छिपा है?...अर्थत-अच्छे कार्य को रोकना,और वोट की खातिर मूर्खतापूर्ण कार्यों को उत्साह-पूर्वक करते हैं- इसमें जनता की गाढी कमाई का पैसा भी लगाते हैं.!

ऐसा नहीं कि सिर्फ़ काँग्रेस ऐसी हैनासब के सब दलों का एकसा रवैया रहता है वोट-बैन्क के लिये. खाराबी व्यक्ति,दल या उनके सिद्धान्तों की तुलना में इस सिस्टम की ज्यादा है.

मानव-संसाधन मन्त्रालय को शिक्षा-अधिकारियों ने अपनी कठिनाई भी बताई. बहुत बुद्धिमान छात्र रहते तब भी बीते समय में हो चुकी पढाई के साथ चालू कोर्स भी करते जाना कोई हँसी खेल नहीं. नये बैच को लगातार कठिनाई रहेगी. खूब समझाया, मगर वह सरकारी आदमी ही क्या जो समझ जाये, फिर ये तो मन्त्री थे- अर्जुन सिंह नाम है इनका. अर्जुन के बाण अचूक, इनके निर्णय अपरिवर्तनीय….मजा यह कि इस मामले में कोई रिट याचिका की भी नहीं सोचेगा. .बी.सी. का मामला है, खूब सेंसिटिव. राजनिती,प्रशासन,न्याय-कानून-सब बेबस , सब लाचार.भारतीय समाज को कैसी लाचारी दे दी है कि सारी बात समझ में आने पर भी कोई समाधान ना निकाल सके. आरक्षण के भूत को इतना विकराल बना दिया कि अब वह अपने जनक इस व्यवस्था तन्त्र को समूल चौपट करने पर आमादा हो गया है. इस बात की हामी एक सजग साहित्यकार की तरह सिनेमा भी खूब भर रहा है. राजनीति-प्रशासन, कानून-न्याय-प्रणाली आदि की विसंगतियों पर गंभीर प्रश्न उठाती कई फ़िल्में आई हैं, आ रही हैं. रंगदे बसन्ती,सूट ओन साईट,एवं आने वाली फ़िल्म देश-द्रोही कुछ सशक्त नाम हैंऔर भी अनेक हैं.

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Wednesday, November 5, 2008

घुघूतीबासूती: धन्यवाद के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं।

घुघूतीबासूती: धन्यवाद के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं।
रोग.जरा और मरण की, चिन्ता छोङॆं आप.
करें शब्द की साधना,अमर बनेंगे आप.
अमर बनेंगे आप,कोई अच्छा विचार दें.
इसी ब्लाग पर,सबको अपना विरल प्यार दें.
कह साधक कवि,नाम और चेहरा भूल जायेगा.
घुघुती बासुती ब्लाग पर याद आयेगा.

Hindi Blog Tips: आपके शहर के ब्लॉग के क्या हाल हैं?

Hindi Blog Tips: आपके शहर के ब्लॉग के क्या हाल हैं?
मजा आ गया आपका, पढकर लम्बा लेख.शहर-सहर के भिन्न हैं, मगर सुस्त आलेख.बहुत सुस्त आलेख, नही है जागरूकता.अपने हाल मे मस्त,क्यों करें कोई चिन्ता?कह साधक कवि,लायेगा यह जागरूकता.पढकर प्यारा लेख, मजा आ गया आपका.

Tuesday, November 4, 2008

कर्मचारी के कर्म: उड़ीसा में छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों को हरी झंडी

कर्मचारी के कर्म: उड़ीसा में छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों को हरी झंडी
पब्लिक-धन की लूट है, जितना चाहे लूट.
सरकारें भी अपनी है, दे अपनों को छूट.
दे अपनों को छूट, रेवङी अँधा बाँटे.
देश भल्रे ड्बे, कितने ही हों फ़िर घाटे.
कह साधक कवि,सरकारी कर्मी को काम की छूट.
बिन मेहनत की डबल कमाई,पब्लिक-धन की लूट.