आया
नवम्बर,२००८ का टेलीग्राफ़ देखें.मुख-पृष्ठ की पहली खबर…. भारत की सभी उच्च-शिक्षा संस्थानों को शिक्षा-सत्र के ठीक बीच में नये छात्रों को प्रवेश देना पङेगा. मानव- संसाधन- मन्त्रालय ने सभी व्यवहारिक कठिनाईयों को ताकपर रखकर विश्व-विद्यालयों को यह आदेश दे दिया है. ओ.बी.सी. के पाँच हजार छात्रों को उपलब्ध रिक्त स्थान भरने के नाम पर लिया जाये, यदि इस कोटे के सभी छात्र ले लिये जाने के बाद भी कोई स्थान बच जाता है, तो उसके लिये योग्यतानुसार अन्य छात्र लिये जा सकेंगे.- इस सरकारी फ़रमान के फ़लितार्थ कुछ इस प्रकार होंगे-१-५००० ओ.बी.सी. के छात्र देश के बीसीयों ऊच्च शिक्षा संस्थानों में भर्ती किये जायेंगे.गत आधे साल में जितनी पढाईहो चुकी है,उसे इन छात्रों को अतिरिक्त रूप से पढाने की व्यवस्था संस्थानों को करनी पङेगी.निश्चित है कि संस्थान इस्की पूरी व्यवस्था करेंगे, इसके लिये केन्द्र से अतिरिक्त धन भी उपलब्ध कराया गया है; किन्तु प्रश्न यह है कि जो छात्र सामान्य से कम बुद्धि के रहे हैं,; पहले से सरकारी कृपांक पाकर ही उत्तीर्ण होते आये हैं, वे पढाई की दोहरी मार कैसे झेळ पायेंगे?...-२-उनको फ़ेल तो नहीं किया जा सकता ना! किसी न किसी प्रकार उनकओ पास करके समाज के मत्थे मढ दिया जायेगा. कोई दाक्टर बनेगा, कोई इन्जीनियर.अब यह इन्जीनियर –डाक्टर कैसे होंगे, इसकी भविष्यवाणी तो मेरे-आपके जैसा सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी कर सकता है. तो इनकी नौकरी की गारंटी भी तो सरकार की ही है- निजी प्रतिष्ठानों में तो योग्यता के आधार पर ही लिया जाता है. सरकारी सेवाओं में योग्यता नकारी जाती है.राजनैतिक समीकरण,रिश्वत,जातिवाद,भाई-भतीजावाद,काईयाँपन और काहिली ईत्यादि नौकरी के आधार बनते हैं.तो वह बनेगा सरकारी नौकर,सरकारी ठसक के साथ.-३-सरकारी डाक्टर ईलाज करेगा मरीजों का- आता कुछ है नहीं- तो मरीज का मरना या ज्यादा बीमार पङना तय.इस प्रकार सैकङों केस होने पर उस डाक्टर (या इन्जीनियर) की ख्याति (!) हो जायेगी. अपने अन्य अनेक सरकारी मित्रों की तरह मरीज उसके नाम से कतराने लगेंगे…जैसे आज कोई खाता-पीता आदमी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढने के लिये नहीं भेजता, जो भेजते हैं मिड-डे मील के लिये. अपना र्जगार खुद कमाने नही देगी सरकार, रोटी बाँटकर सबको भिखारी बनाकर रखेगी…ताकि बदले में हमेशा वोट मिलते रहें.-४-एक दुष्परिणाम सबसे गंभीर! लोग-बाग डाक्टर-इंजीनियर से उनकी जाति पूछेंगे. यदि कोई ओ.बी.सी. का हुआ तो उससे ईलाज ही नहीं कराएंगे…मरना थोङे ही है!
इस प्रकार सरकार के इस कदम से देश और जनता का बँटाढार होना तय है. यदि कुछ बाकी रह जये, तो इसका इन्तजाम भी किया है.गोआ और हरियाणा में डेन्टल कालिज खोलने की पेशकश हुई…धनिकों ने पूरे मनोयोग से भवन आदि खङे किये…सरकारी अपेक्षा के अनुरुप सारे सामान जुटाये…ऊच्च पदाधिकारियॊं और राजनेताओं को ऊँच्ची-ऊँची रिश्वतें तक दी गई…करोङों खर्च हो जाने के बाद सरकारी परमिशन नहीं मिली…कोर्ट की शरण में हैं…और न्यायालयों में ऐसे मुकद्दमों के निपटारे में कितनी पीढीयाँ खप जाती हैं, यह किससे छिपा है?...अर्थत-अच्छे कार्य को रोकना,और वोट की खातिर मूर्खतापूर्ण कार्यों को उत्साह-पूर्वक करते हैं- इसमें जनता की गाढी कमाई का पैसा भी लगाते हैं.!
ऐसा नहीं कि सिर्फ़ काँग्रेस ऐसी है…ना…सब के सब दलों का एकसा रवैया रहता है वोट-बैन्क के लिये. खाराबी व्यक्ति,दल या उनके सिद्धान्तों की तुलना में इस सिस्टम की ज्यादा है.
मानव-संसाधन मन्त्रालय को शिक्षा-अधिकारियों ने अपनी कठिनाई भी बताई. बहुत बुद्धिमान छात्र रहते तब भी बीते समय में हो चुकी पढाई के साथ चालू कोर्स भी करते जाना कोई हँसी खेल नहीं. नये बैच को लगातार कठिनाई रहेगी. खूब समझाया, मगर वह सरकारी आदमी ही क्या जो समझ जाये, फिर ये तो मन्त्री थे- अर्जुन सिंह नाम है इनका. अर्जुन के बाण अचूक, इनके निर्णय अपरिवर्तनीय….मजा यह कि इस मामले में कोई रिट याचिका की भी नहीं सोचेगा. ओ.बी.सी. का मामला है, खूब सेंसिटिव. राजनिती,प्रशासन,न्याय-कानून-सब बेबस , सब लाचार.भारतीय समाज को कैसी लाचारी दे दी है कि सारी बात समझ में आने पर भी कोई समाधान ना निकाल सके. आरक्षण के भूत को इतना विकराल बना दिया कि अब वह अपने जनक इस व्यवस्था तन्त्र को समूल चौपट करने पर आमादा हो गया है. इस बात की हामी एक सजग साहित्यकार की तरह सिनेमा भी खूब भर रहा है. राजनीति-प्रशासन, कानून-न्याय-प्रणाली आदि की विसंगतियों पर गंभीर प्रश्न उठाती कई फ़िल्में आई हैं, आ रही हैं. रंगदे बसन्ती,सूट ओन साईट,एवं आने वाली फ़िल्म देश-द्रोही कुछ सशक्त नाम हैं…और भी अनेक हैं.
Labels: आरक्ष राजनीति

3 Comments:
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उम्मेद जी, नमस्कार।
बहुत ही सुन्दर प्रयास
शम्भु चौधरी
शम्भुजी,नमस्कार! धन्यवाद, किन्तु संतोष नहीं है.
लिन्क नही कर पा रहा, html का प्रयोग भी नही हुआ.मेरे ब्लाग का चेहरा भी सजना बाकी है. सब बन्दुओं को उम्मीद है कि मैं ज्यादा काम करुँ, पर ब्राड-बैन्ड की सेवा ही नहीं मिलती. फ़िरभी, आपका पुनः धन्यवाद. उम्मेद साधक
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