Wednesday, November 26, 2008

मुम्बई का सच

बोलो क्या अब भी रखें,साम्पर्दायिक सद्भाव?
वे हम पर हमला करें, हम रखें सद्भाव.
हम रखें सद्भाव, और मर जायें शान से.
जैसे सारे अफ़सर, मारे गये जान से!
पूछे साधक, एक बन्दूक नेता पर रखके.
साम्प्रदायिक सद्भाव, बोलो क्या अब भी रखें?

शपथ हमें इस राष्ट्र की,वरण विजय कर लेंगे.
घर में घुस बैठे दुश्मन को,मौत की सजा देंगे.
मौत की सजा देंगे,अब कुछ देर नहीं है.
ईश्वर के घर देर भले.अंधेर नहीं है.
कह साधक कवि,राजनेता आङे आयेंगे.
क्रुद्ध हिन्दू तब भी, वरण विजय कर लेंगे.

युद्ध निमन्त्रण दे रहा,लो कर में तलवार.
टाल गये सैतालिस में,अब थामो हथियार.
अब थामो हथियार,बचा लो अपनी भूमि.
नेता बेचे वोट के बदले, अपनी भूमि.
कह साधक इन नेताओं का काल आ रहा.
लो कर में तलवार, युद्ध निमन्त्रण दे रहा.
क्यों आयेंगे बाहर से,आतम्की सरदार.
गली-गली में हैं भरे,सौ-सौ नही-हजार.
सौ-हजार या लाख, कौन गिन पाये इनको.
ये दामाद कोई कुछ ना कह सकता इनको.
कह साधक कवि,क्या हो सकता अब बाहर से.
भीतर ही बदलो, क्यॊ सोचते हो बाहर से.

गाँधी-नेहरु वंश को, भुगत रहा है देश.
सदाशयता की अति हुई, अब तो जागे देश.
अब तो जागे देश,समझ ले बात ये पक्की.
धर्म-युद्ध से बचना मुश्किल,शश्वत-सच्ची.
कह साधक कवि,टाला सैतालिस में जिसको.
भुगत रहा है देश, गाँधी-नेहरु वंश को.

जो चाहे कर सकते हैं,फ़ायरिन्ग, बम-विस्फ़ोट.
उनकी रहम पे देश है, क्या यह कम विस्फ़ोट!
क्या यह कम विस्फ़ोट,कि नेता उन्हें बचाते.
न्याय-कानून-संविधान, की दोहाई देते!
कह साधक जो यह सब कुछ बदल सकते हैं.
उठे हिन्दू ललकार, जो चाहे कर सकते हैं.

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