Tuesday, November 18, 2008

मुसलमान

फिल्म सूट ओन साईट-समीक्षा
जगमोहन मून्दङा शायद ब्रिटैन में रहते हैं,पर फिल्म को ब्रिटेनी पृष्ठभूमि देने का कारण सिर्फ़ यही नही कि उनको वैसे विषय के लिये उपयुक्त कलाकार आसानी से मिल जायेंगे ( दो-तीन को छोङ कर सारे ही इंगलिश पात्र हैं ), बल्कि इस फिल्म के जरिये यह कहना चाहते हैं कि भारत आतंकवादियों के लिये जितना नरमी दिखाता है,ब्रिटेन उतना ही सख्त है.इतना सख्त, कि सिर्फ़ शक के आधार पर एक युवा मुस्लिम युवक को पुलिस अफसर गोली से मार देता है,इसके कारण उठने वाले सारे प्रश्नों का मुकाबला करते हैं,कहीं कोई समझौता नहीं, वोट-बैन्क-जनित समीकरण नहीं दिखता ब्रिटेन में.पुलिस-प्रशासन पर कोई अनचाहा राजनैतिक दबाब भी नहीं दिखा.

“प्रश्न यह नहीं कि हर मुसलमान आतंकवादी है कि नहीं,यहाँ प्रश्न यह है कि हर मुसलमान आतंकवादी क्यों है ?...और दोनों ही प्रश्नों के उत्तर सभी को मालूम है…”-यह संवाद भारत में अत्यन्त संवेदनशील माना जायेगा, किन्तु ब्रिटेन का एक पुलिस-आफ़िसर संजीदगी पूर्वक अपने विरूद्ध जाँच कर रहे आफ़िसर से कहता है .श्री तरुण विजयजी का स्मरण आता है…उनके टी.वी. साक्षात्कार पर कहे गये ये शब्द अब तो मुहावरा सा बन गये हैं,देश में ही नहीं, विदेसी कथानकों में इस मुहावरे का प्रयोग आम-धारणा की सूचना है.

पूरा विश्व मानस आज इस्लाम और मुसलमान समाज की आक्रान्ता वृत्ति की समालोचना में लगा है.
साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है-सिनेमा साहित्य की ही एक सशक्त विधा है- और भारतीय फ़िल्मकार इस विषय पर प्रामाणिक कार्य कर रहे हैं. आश्चर्य होता है कि सेकूलर राजनेता, इन्डिया की न्याय-कानून व्यवस्था,और अंग्रेजी मीडीया कोई हाय-तौबा क्यों नहीं कर रहा है !सिलसिला तो खुद आमीर खान ने ही शुरु कर दिया था-फ़िल्म फ़ना से. फ़ना का आतंकवादी हीरो मुसलमान- उसकी सोच पूरे मुस्लिम समाज की सोच को प्रतिबिम्बित करती है,इस्लाम का परिचय देती है. इस्लाम की असहिष्णुता, मुल्क और यहाँ के मूल समाज के प्रति उनकी धारणा… सभी कुछ तो स्पष्ट है. …फिर प्रसिद्ध निर्माता सुभाष घई ने ब्लेक एन्ड वाईट दी. निर्देशक ने बहुत कोशिश की-सेकूलर बनाने की,स्वयं हीरो अनिल कपूर एक हिन्दू प्रोफ़ेसर के रूप में कुरान को मासूम बताने की जिद्द करता है-किन्तु साथ खङा मौलवी ही हिन्दू सदाशयता को एक तरफ करके कहता है कि इस्लाम का भाईचारा सिर्फ़ अपनी कौम के लिये है,काफ़िर को दोजख दिखाना तो अल्लाह-ताला का ही हुक्म है. !

आमीर फ़िल्म तो इससे एक कदम आगे बढ जाती है-मुस्लिम मानसिकता को बेपर्दा करने में.वैसे बेपर्दा करने की बात ही नहीं, क्योंकि सभी मुस्लिम विद्वान-उलेमा आदि एकमत हैं… सिर्फ़ हिन्दू ही उदारता में सभी धर्म एक समान है का राग अलापते रहते हैं. आमीर का नायक इन्गलैंड से डाक्टरी पढकर भारत लौटता है, और एयर-पोर्ट पर ही चैकिंग- अफ़सर के व्यवहार से हैरान रह जाता है, कि मुसलमान होने मात्र से उसपर आतंकवादी होने का शक किया जा रहा है. फ़िल्म अपने हर फ़्रेम में यही बात बार-बार दोहराती है, स्वयं मुसलमाअनों के द्वारा कहलवाती है, कि भारत में रहने वाला हर अमीर-गरीब, पढालिखा-अनपढ मुसलमान आतंकवादी है. नायक यह साबित करना चाहता है कि वह आतंक के इस भयानक खेल का हिस्सा नही है, तो उसे अन्त में मरना पङता है. नायक के एक अच्छे संदेश हेतू मरने का लाभ यह होना चाहिये था कि, मुसलमानों को अपनी सोच पर अफ़सोस हो जाता. निर्देशक इस बात को आराम से दिखा भी सकता था, किन्तु नहीं.
फ़िल्म का नाम देखकर भी चौंकना पडता है. सूट ओन साईट. अंग्रेजी में होता है सूट एट साईट. ….इस सूट ओन साईट का क्या मतलब! जी हाँ, आप ठीक ही समझे हैं. सूट ओन साईट- देखते ही गोली मारो….पश्चिमी देशों में यही धारणा आम हो रही है….हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है…क्रिया के समान…और उसके विरुद्ध.
प्रकृति का यह नियम वर्तमान में शायद सहिष्णु और उदार हिन्दु प्रकट करने लगा है…..साध्वी प्रज्ञा सिंह पर यदि विस्फ़ोट कराने के आरोप सिद्ध होते हों, तो यही समझा जायेगा.

1 Comments:

At November 18, 2008 at 10:39 AM , Blogger Girish Billore Mukul said...

jai ho
ye chiththa charchaa thee mahaaraj jisaka sar hota n pair
guruji
aapaka aalekh abhi tippani nahee doongaa samay aane par zaroor bat hogi
shailee achchhee hau

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home