Wednesday, November 19, 2008

बदलता संगघ

आदरणीय संपादक,पाँचजन्य साप्ताहिक. सादर नमस्कार.
१४ सितम्बर के अंक में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा बिहार बाढ राहत कार्य की छ्पी फोटो देख कर मन में वेदना भी हुई, कई प्रश्न भी खडे हुए .फोटो में दिखाया गया है कि स्वयं सेवक संघ की हाफ-पेन्ट पहनकर मुसलमानों के रोजे तुडवा रहे हैं, उनको आदर पूर्वक भोजन करा रहे हैं. निश्चित ही संदेश यह देना चाहते हैं कि,
-१- संघ को सांप्रदायिक समझना भूल है, वह तो मुसल्मानों को अपना बंधु ही मानता है.
-२-संघ सेवाभावी है,पूरी मानवता की सेवा करता है-बिना किसी भेद-भाव के.
-३-यह देश सबका है, हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई-कसाई …आपस में सब भाई भाई….आदि,आदि
श्री आलोक जी ने फोन पर बताया कि, फोटो संघ के आधिकारियों ने ही भेजी है, एक नहीं कई फोटो भेजी-सारी की सारी इसी प्रकार की हैं, तो हम क्या करें…दुःख तो हमें भी है,…

यह सुनकर वेदना और बढी .प्रश्न विकराल हैं-
-१- क्या संघ ने अपने अपरिवर्तनीय सिद्धान्तों को छोड दिया है ? ’हिन्दुत्व ही राष्टीयत्व है’ वर्षों तक इस निष्ठा को ह्र्दय में संजोये जिन हजारों- लाखों स्वयं सेवकों ने अपना जीवन झोंक दिया, क्या वे गलत थे ?
क्या संघ-निर्माता डाक्टर हेडगेवार भी गलत थॆ ?
मान लिया कि किसी चिन्तन बैठक (!) में ऐसा निर्णय करलिया गया हो… तो क्या इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिये ? देर-सवेर ही सही; कोमरेड भी अपनी भूलें स्वीकार कर लेते हैं भाई साहब ! फिर हम तो स्वयं को भारत की सनातन-सांस्कृतिक धारा के पुरोध्धा समझने वाले भद्र लोग हैं ! और फिर प्रार्थना में परिवर्तन !
वयं हिन्दु राष्ट्रांग्भूता…त्वया हिन्दुभूमे ....यह सब नहीं चलेगा ना ! पर प्रार्थना तो हमारा मन्त्र है, इतने वर्षों तक ह्रदय पर हाथ रखकर करोडों स्वयंसेवकों ने साधना की है इस मन्त्र की ! मन्त्र भी सुविधानुसार बदले जा सकेंगे ?
-२-इतने वर्षों सेमुसलमानों को बन्धु बनाने का गंभीर प्रयत्न चल रहा है…कितने बने ?और जिन्होंने किसी न किसी स्वार्थवश बनने का नाटक भी किया है, उनमें से कितनों को अपने समाज का साथ मिला है ?कितने मुसलमानों ने अपनी बेटियां हिन्दुओं को देने की मन्शा जताई ? कितने मुसलमान गर्व पूर्वक कहने लगे हैं कि उनकी रगों में भगवान श्रीराम का रक्त बहता है और बाबर हुमायूँ आक्रांता थे ? यही कसौटी होगी ना सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की ! या फिर कसौटियाँ बदल गई हैं –जैसे सरकारें अपनी सुविधा से गरीबी कि रेखा ही बदलती रहती है ! और कितने आयामों में घुसी है ऐसी सरकारी प्रवृति ?... संघ पर समाज आँख मूँदकर विश्वास करता है भाई साहब…महाजनो येन गतः स पन्थाः…इस प्रकार पूरा मार्ग ही भ्रष्ट करदेने का कलंक संघ की अब तक की सारी तपस्या पर पानी नहीं फिरा देगा क्या ?...मुसलमान को भाई बनाने का जितना और जैसा प्रयत्न महात्मा गाँधी ने किया,वैसा तो सौ संघ-परिवार मिलकर भी सात पीढीयों तक नहीं कर पायेंगे…और तब भी कुत्ते की पूँछ टेढी की टेढी. मूसल ही मानता है , उसे प्यार देकर कैसे मनायेंगे जी… यह तो एक मूसल-मान का अपमान ही हुआ ना !

-३- भारत के साथ गत हजार वर्षॊं से जैसा अत्याचार चला रखा है…पाकिस्तान दिया…फिर पाकिस्तान के खूनी पंजों से बंगला देश मुक्त कराने में भारत ने कितनी कुर्बानियां दी…लेकिन …एक की बजाय दो दुश्मन देश हैं आज भारत के पास…फिर भी मुसलमान से बन्धुत्व !...वह भी संघ की प्रेरणा से…राम राम !

-४-श्री गुरुजी जन्म-शताब्दी वर्ष सारे विश्व में मनाया गया… महाराष्ट्र ईकाई का एक फ़ोल्डर देखा था…आयोजन समिती में तीन मुसलमानों के नाम देखकर भौंच्चक्का रह जाना पडा. …हम बंगाल में रहते हैं… मुस्लिम बहुल जिलों के गावों में युवा-किशोर हिन्दू लडकियों का बडे पैमाने पर यौन शोषण चलता है…कोई कुछ नहीं बोल पाता… विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल टुकुर टुकुर देखते रहते हैं…काली के कलकत्ते में काली मन्दिर हटाने का फ़र्मान सरकारी कारिन्दे भेज देते हैं…कौन सामने आये ?...जी हाँ… कलकत्ते के साल्टलेक ई.सी.७१ की बात कररहा हूँ…संघ स्वयं तो चुप बैठता ही है… जो कुछ मुट्ठीभर युवक अपनी जान हथेली पर रखकर इसका विरोध करने आगे आते हैं…संघ उनका यह कहकर विरोध करता है कि अब वे प्रचारक नहीं रहे ! निष्ठा संस्कृति-समाज के प्रति या सिर्फ़ संगठन…भले कुछ ना… करे तबभी संगठन…संगठन के लिये संगठ्न का यह कैसा परिणाम भाई साहब !
और स्वयं पूजनीय श्री गुरुजी ने इस हिन्दू राष्ट्र के पहला दुश्मन मुसल्मान को गिना था…आप लाख कोशिश करलें, मुसलमान इस बात को भूलेगा क्या ? अरे, हमने उसको खुश करने के लिये क्या क्या नहीं किया…उसकी कुरान उसे काफ़िर से दोस्ती करने और उसके साथ खुश होने से मना करती है… कुरान को छोडकर वह आपकी बात मानले, यह तो आपकी ज्यादती है भाई साहब !

५आलोकजी ने कहा कि संघ के ऐसी ही तस्वीरें भेजी …और पाँचजन्य ने छाप दी…ओह ! इसका अर्थ ? संघ सिद्धान्तों के विरूद्ध चले तब भी स्वयंसेवक अपनी बुद्धि न लगाये…इसे अधिकारी सेवक कहेंगे या स्वयंसेवक !
निष्ठा देश-संस्कृति-समाज के प्रति या अधिकारी के प्रति ?...आग्या ! एकचालकानुवर्तित्व !! अनुशासन !!!
एकचालकानुवर्तित्व का अर्थ तो यह था कि संघ पूरा का पूरा एक ही बात सोचता है…जो स्वयंसेवक सोचता है, वही बात सरसंघचालक बोलता है…ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर…अब क्या यह अर्थ भी बदल दिया…फिर से सुविधानुसार !और पाँचजन्य संघ का मुखपत्र है क्या ? संघ तो नहीं मानता कि पाँचजन्य या आर्गेनाईजर उसके मुखपत्र हैं . बार बार इन्कार करते हैं…खैर, स्वयंसेवक के मन का भाव…हाँ…मातृ-संगठन के प्रति आदर रहना ही चाहिये…किन्तु मौलिक प्रश्नों पर भी यदि विरोध न कर सकें,प्रतिप्रश्न न कर सकें…यह क्या ठीक होगा ? पाँचजन्य की ललकार तो भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य सभी के लिये थी…बात संस्कृति-रक्षा की है, और परिस्थितियां बिल्कुल वैसी ही हैं जैसी महाभारत युद्ध से पूर्व थी…द्रौपदी का चीरहरण लगातार जारी है…उसकी चीखें भी …और संघ मूक…दरबार में मौजूद भी है…उसकी मौजूदगी समकालीन सभी वीरों को रोक रही है , द्रौपदी की रक्षा करने से…न हो तो उसकी रक्षा के प्रयत्न मे अपनी जान देने से .
तभी तो पाँचजन्य भी… पाप की भागीदारी कर लेता है…विकर्ण तक की यही दुविधा थी कि जहाँ भीष्म हैं वहाँ अन्याय कैसे हो सकता है ! जब संघ कह रहा है कि मुसलमान राष्ट्रवादी हो सकता है…तो सबको कुरान खोलकर देखने की जरूरत क्या है… है ना संघ…है ना भीष्म पितामह…सभी राष्ट्रवादियों का बाप… अजेय..सर्वशक्तिमान..बाल ब्रह्मचारी …तत्वग्य…धर्माचरण में आदर्श…वह बचा लेगा देश को विभाजित होने से…जैसे गाँधी बाबा ने बचाया था !.... …. हे फाँचजन्य !मत छ्लो ! मत बनो निमित्त हिन्दू मन को भटकाने में…मत होने दो स्वयं को किसी भर्मित भीष्म का उपकरण.! राष्ट्र और संस्कृति रक्षण का प्रश्न हो तो नचिकेता बनना पडता है… अपने ही बाप को शिक्षा देने के लिये मृत्यु के द्वार तक जाना गौरव की बात होती है…है कि नहीं!

-६- सिद्धान्त छोडने लगो तो पता ही नहीं चलता कि क्या क्या छूटने लगा है… याची देही याची डोळा की त्वरा गई , नहीं नहीं करते भी वोट-राजनीति के चंगुल में फसे,राम-मन्दिर के गौरवशाली प्रकरण तक की जिम्मेदारी से पीछे हट गये…अब तो चिन्तनशील वरिष्ठ प्रचारकों तक को सरसंघचालकजी के २०११ की घोषणा की सफलता का भरोसा नहीं है…नाम देना उचित नहीं , लेकिन यह तो ऐसा रहस्य है जो सबको पता है…पाँचजन्य नहीं बोलेगा तो कौन बोलेगा ?उन्हें बोलिये…हम गलत हैं तो हमें बोलिये…छापना या न छापना आपकी मर्जी, मगर मौन मत हो जाईयेगा भाई साहब ! जो प्रश्नों से बचता है , उसे मरना पडता है… मरने से तो अच्छा है कि राष्ट्र के इस दुश्मन से संघर्ष करें…हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग्यं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम…तस्मात्वमुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत्निश्चय .

चाहें तो इसे किसी को भी भेज सकते हैं ………….उम्मेद सिंह बैद साधक

3 Comments:

At November 20, 2008 at 1:02 AM , Blogger Renu Sharma said...

saadhak ji , prnaam , blog tak aakar comment karne ke liye shukriya .
aapaki bhavnaon ka khyaal rakhne ka prayas karungi .

 
At November 20, 2008 at 7:13 AM , Blogger Aadarsh Rathore said...

ये अधोन्मुख मुझे भी विचलित कर रहा है
:(
कृपया सेटिग्स में जाकर वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें

 
At November 21, 2008 at 1:27 PM , Blogger eBhopal said...

Blog ka naam Ummeed ki jagah Aasha jona chahiye....

 

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