Saturday, November 29, 2008

पंचायतनामा: ठहरें, जरा आतंकियों के बारे में भी सोचें....

पंचायतनामा: ठहरें, जरा आतंकियों के बारे में भी सोचें....सन सैतालिस में यदि, हो जाता यह युद्ध.
ना होता भारत खण्डित,निश्चित जीतते युद्ध.
जीतते हम यह युद्ध, देश का गौरव बढता.
मेरा शाश्वत देश, धर्म का मार्ग पकङता.
कह साधक सांस्कृतिक युद्ध से बचना मुश्किल.
युद्ध से बचकर इस दुनियाँ में जीना मुश्किल.

3 Comments:

At November 30, 2008 at 11:22 PM , Blogger hindustani said...

बहूत ही सुंदर रचना

 
At December 1, 2008 at 10:37 PM , Blogger Unknown said...

क्रन्ति शुरू हो विवेक से, और शान्ति पर शेष.
मुर्दा जले तो शोक शुरु,्बारह दिन पर शेष.
बारह दिन पर शेष हो, ऐसा शोक नही यह.
दुष्ट-तन्त्र जिन्दा जब तक, है शेष नहीं यह.
साधक करे गुजारिश, भारत के विवेक से.
करो शान्ति के लिये क्रान्ति,शुरु हो विवेक से.

aapne meri kalam ko nayi disha hi de di....mujhe naye aayam se jodne ke liye dhanywad.....

blog par aate rahe aapki aashirwad mujhe chahiye hi chahiye....


Jai Ho Magalmay Ho....

 
At December 6, 2008 at 9:10 AM , Blogger राहुल सि‍द्धार्थ said...

अजी युद्ध ही एक मात्र तो विकल्प नहीं है.जब तक संभव हो हमें इससे बचना चाहिए.रही संस्क्रती की बात तो हम अनेकता में एकता के सबसे बड़े मिसाल है तो फिर संशय क्या??

 

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